Search This Blog

Tuesday, April 19, 2022

तेरा मेरा अफसाना

पूछता है जमाना

तेरा मेरा अफसाना

लग गया मुख पे ताला

करु क्या मैं बहाना

पूछता है जमाना

तेरा मेरा अफसाना


 ऐसे उभरे तेरे मेरे किस्से

जैसे रेत पे कोई चित्र उकेरे

तंजों तानों के बानों से

आयी एक लहर अंजानी

चित्र संग संग रेत से बह गये

और रंज रंज लिख गये ।


गाऊ क्यामैं तराना

कब का गुजरा जमाना

रीत है ये पुरानी

प्रीत की ये निशानी

रहती अधूरी कहानी

अब तो बंद मुस्क्याना

पूछता है जमाना

तेरा मेरा अफसाना


 प्रीत के आमंत्रण से

और रीत के निमंत्रण से

गीत मेरे श्रृंगार कर रहे

उपमा रूपक फीके-फीके

प्रीत का रस पीके-पीके

सुध-बुध भी भूले जग के


ओ सनम का तराना 

रात दिन गुनगुनाना

रह रह आईना ही निहारे

सज रहे सांझ सवेरे

रात दिन छटपटाना

ओ मिलना मिलाना

पूछता है जमाना

तेरा मेरा अफसाना


रीत जमानों का सच्चा है

और प्रीत जमानें में झूठा है

जमानों की सच्चाई में

गीत भी रूठा-रूठा है

मलयानिल संग मन्मथ भी

इस जमाने में टूटा-फूटा है।



झूठा आशिकाना

लुट गया आशियाना

वो पाप पूर्व जनम के

भुगत रहे इस जनम में

नीड़ उजाड़े जो कल थे

आज नीर अश्कों से बह रहे है 

बड़भागी जमाना

वो छलना छलाना

पूछता है जमाना

तेरा मेरा अफसाना



प्रीत ने मुख मोड़ लिया

गीत ने मुख चूम लिया

पर रीत न भूला सका प्रीत की

अश्कों अश्कों दर्द बहाता

संग संग प्रीत के बहता रहता

हर्फ-हर्फ प्रीत के नगमें सजाकर

गीत प्रीत के ही गाता रहता



लिखता रहता तराना

 महफिलों को सजाना

साथ मेरे जमाना 

तेरे नगमे गुनगुनाना

पूछता है जमाना 

तेरा मेरा अफसाना



No comments:

Post a Comment

आगे हाथ लगाएंगे पीछे हाथ लगाएंगे

आगे हाथ लगाएंगे पीछे हाथ लगाएंगे  आगे हाथ लगाएंगे पीछे हाथ लगाएंगे इसी असमंजस में हम तो सालों साल बिताएंगे  पानी मुफ्त बांटेंगे बिजली मुफ्त ...