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Wednesday, March 16, 2022

जन जन का तारणहार बनके राम सा अवतार मेरा (राम गीत)

पितु वचन रक्षण, मातु हठ  में

 भटकत फिरत वन कानन में

तड़पते जन जन के मन में पनपने दो विश्वास मेरा

सिय तेरे बिन हिय न धड़के हिय सो तड़पे बारम्बार मेरा

जन-जन का तारणहार बनके राम सा अवतार मेरा।


स्वर्ण मृग सा कैसा ये हठ था

हठ हो जैसा पर ये छल था

था नहीं ये राम सा चित्कार मेरा 

जो तूने लखन को पठाया

भूल कैसी ये हुयी जो भूल कर संवाद मेरा

सिय तेरे बिन हिय न धड़के हिय सो तड़पे बारम्बार मेरा

 जन-जन का तारणहार बनके राम सा अवतार मेरा



दर-दर  ढूंढ़ा वन-वन भटका

गिरी कानन उपवन दारुण वन

जन-जन, कण-कण, तृण-तृण खग-खग

 मृग-मृग दिक्-दिक् भी परखा

जॅंह जॅंह मन मेरा देवे खटका

सागर तक को भी नहीं बख्शा

सागर फतह कर फतह हेतु सेतु निर्माण मेरा

सिय तेरे बिन हिय न धड़के हिय सो तड़पे बारम्बार मेरा

जन-जन का तारणहार बनके राम सा अवतार मेरा


मेघनाथ, कुम्भकरन, रावन वध

तव सम्भव प्यासे पथराये नयन को यह मधुमय

दुर्दिन बीते सुभ दिन आए, 

पर रघुकुल रिति का हठ

और मेरा राम सा सठ

जन-जन के बहकावे में फंस कर,अग्नि परिक्षा क्या अधिकार मेरा

सिय तेरे बिन हिय न धड़के हिय सो तड़पे बारम्बार मेरा

जन-जन का तारणहार बनके राम सा अवतार मेरा



अब न कोयल  कूकती है

ना ही पपीहे के ही स्वर 

 मेरे राम से कर्ण पटल पर गूंजते है

अब न सावन ना बसंत न दिवारी न ही होरी

और सावन के दिनों मैं राम सा सठ

याद कर अपना राम सा हठ

मैं उसी सावन में खुद को कोसता हूं

आज होरी के भी रंगों राम सा बदरंग हूं

इह जहां से उह जहां में त्याग कर संसार मेरा

सिय तेरे बिन हिय न धड़के हिय सो तड़पे बारम्बार मेरा

जन-जन का तारणहार बनके राम सा अवतार मेरा




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