रीत लिखे हैं गीत लिखे हैं
मन से जितने मन को चाहा
सब पे एक एक गीत लिखे हैं।
इक दिन दर्द कश्मिरियों के
मैं पी गया मैं जी गया
हार लिखे है जीत लिखे हैं
पाक लिखे हैं नापाक लिखे हैं
भाग लिखे हैं अभाग लिखे हैं
प्रीत लिखे हैं गीत लिखे हैं
जितने मन से मेरा मन तुम
सुन लेते हो तुम गुन गुन
उस मन से तुम इस मन का भी
मन से दुख तुम लेना सुन
सैतालिस की गांधी की वो करतूत
जो खुद बनने को देवदूत
दर्द अपनों के जाके भूल
लिया उनको को भी कबूल
जो चुके थे विभाजन भी कबूल
जिनके भालों की नोंको ने
नब्बे में भी खेली खूनी होली
जिनके वहशी ख्वाबों ने
उन दरिंदों के खूनी पंजों ने
उन अभागे मां बहनों के
सिंदुर उजारे थे
संग बदन भी उघारे थे
अरे नोंचे थे काटे थे
मारे थे चिल्लाये थे
हम पाक तू नापाक
है कश्मीर हमारे भाग
अरे भाग भाग रे कश्मीरी अभाग
ये कश्मीर हमारा है।
गीत लिखे हैं प्रीत लिखे हैं
रीत लिखे हैं गीत लिखे हैं
मन से जितने मन को चाहा
सबपे एक एक गीत लिखे हैं।
थे जनता के जो जनार्दन जो
उन आर्तों का दर्द सुन न सके
अरे सुन न सके न गुन ही सके
गुन न सके न धुन ही सके
मेरे संग संग इस धुन को
तुम सब मिल मिल के गाओ
तन से गाओ मन से गाओ
अरे गाओ गाओ सबको सुनाओ
इतना गाओ इतना सुनाओ
अरे गाओ गाओ उन बहरों को भी सुनाओ
जिनके कानों के पर्दे
थे सैतालिस में सिले गये
अरे नब्बे में भी नहीं खुले
बाइस में भी कहते न थकते
जिनका जिनका निर्वासन
जो चढ़ गये भेंट उस नरसंहार
अरे उन मां बहनों के दर्दों का
हिसाब नहीं जबाब नहीं
उन दिन के अनुचित कृत्यों का
है उचित डाटा उपलब्ध नहीं
कितने जारे कितने उजारे
कितने मारे कितने उघारे
कितने काटे कितने नोंचे
है उचित डाटा उपलब्ध नहीं
है एक ही हल उस नर संहार का निर्वासन का
जब तक हल न हो वह निर्वासन
तुम सब बन्द करों निर्वाचन
गीत लिखे हैं प्रीत लिखे हैं
रीत लिखे हैं गीत लिखे हैं
मन से जितने मन को चाहा
सबपे एक एक गीत लिखे हैं
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